उनका चेहरा गुलाब जैसा है ,
उनका हुस्न महताब जैसा है .
धूप की क्या उन्हें ज़रुरत है ,
वो तो खुद आफताब जैसा है .
उनसे क्यों कर सवाल मैं पूछूं ,
वो तो खुद ही जवाब जैसा है .
कहाँ तक जफा का ज़िक्र करुँ ,
ये तो सारा समाज ऐसा है .
हाय उनकी मिसाल किस से दूं ,
वो तो खुद लाजवाब जैसा है .
क्या कहूं कि वो फूल कैसा है,
मुझको लगता गुलाब जैसा है.
कैसे उनको बनाया कुदरत ने ,
वो मेरे हसीन खाब जैसा है .
हर तरफ आज उनके चर्चे हैं ,
वो किसी महव- ऐ- खाब जैसा है.
क्या दिखेगा उसके आगे प्रदीप ,
उनका चढ़ता शबाब ऐसा है .
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Monday, April 20, 2009
Saturday, April 04, 2009
मैं और मेरी धड़कन
रखूंगा अपने दिल में तुम्हें धड़कन की तरह,
धड़का सदा करोगी मेरी धड़कन की तरह .
मुश्किल हो कि आसां हो जैसी भी घड़ी हो,
रखूंगा तुम्हें अपने साथ दर्पण की तरह .
कहने को तो हम बेशक़ न साथ रहेंगे ,
पर साथ सदा होंगे हमसाए की तरह .
कोई साथ नहीं रहता ता हस्र भले लेकिन,
हम साथ रहेंगे सदा किसी खुशबू की तरह .
जब तपती दुपहरी में साया भी न दे साथ ,
दो जिस्मों में होंगे हम एक जान की तरह .
क्यों डर हो बिछुड़ने का तुमसे मुझे हर पल,
जब आन बसी दिल में धड़कन की तरह .
इस दौर के इन्सान तो हो गए मशीन ,
खा जाते हैं रिश्तों को इंधन की तरह .
ये कैसी हवा अब के इस शहर में आई ,
क्यों दोस्त भी लगते हैं दुश्मन की तरह .
तुमको मेरी उल्फत पे ऐतबार नहीं लेकिन ,
क्यों उसको दिखाऊँ किसी फैशन की तरह.
माना कि अन्धेरा है इस जीवन में बहुत ,
प्रदीप संग जलेगा शमां-ऐ-रोशन की तरह .
धड़का सदा करोगी मेरी धड़कन की तरह .
मुश्किल हो कि आसां हो जैसी भी घड़ी हो,
रखूंगा तुम्हें अपने साथ दर्पण की तरह .
कहने को तो हम बेशक़ न साथ रहेंगे ,
पर साथ सदा होंगे हमसाए की तरह .
कोई साथ नहीं रहता ता हस्र भले लेकिन,
हम साथ रहेंगे सदा किसी खुशबू की तरह .
जब तपती दुपहरी में साया भी न दे साथ ,
दो जिस्मों में होंगे हम एक जान की तरह .
क्यों डर हो बिछुड़ने का तुमसे मुझे हर पल,
जब आन बसी दिल में धड़कन की तरह .
इस दौर के इन्सान तो हो गए मशीन ,
खा जाते हैं रिश्तों को इंधन की तरह .
ये कैसी हवा अब के इस शहर में आई ,
क्यों दोस्त भी लगते हैं दुश्मन की तरह .
तुमको मेरी उल्फत पे ऐतबार नहीं लेकिन ,
क्यों उसको दिखाऊँ किसी फैशन की तरह.
माना कि अन्धेरा है इस जीवन में बहुत ,
प्रदीप संग जलेगा शमां-ऐ-रोशन की तरह .
Tuesday, March 31, 2009
चुप की ज़बान
चुप की ज़बां कभी समझी तो होती ,
मेरे दिल की हालत समझी तो होती .
तेरा रूठ जाना भी वाजिब है लेकिन ,
ज़रा मेरी मुश्किल भी समझी तो होती .
दिखावा मोहब्बत में न आता है मुझको,
जो हालत थी दिल की समझी तो होती .
हजारों तमन्ना बसी मेरे दिल में ,
कोई खाहिश तुमने भी समझी तो होती .
बहुत सारे अरमां थे मेरे दिल में ,
तुमने किसी की कद्र की तो होती .
तुम्हारे लिए ही धड़कता है ये दिल ,
कभी धड़कने भी समझी तो होती .
मोहब्बत के सावन बरसते हैं सब पे ,
कोई बारिश मुझपे भी बरसी तो होती .
तमन्ना मचलकर बयां हो ही जाती ,
ज़रा सी हवा जो दी तुमने होती .
मुलाक़ात तुमसे और जी भर के बातें ,
कहाँ मेरी किस्मत हकीकत ये होती .
ये दिल चाहता है बहुत तुमसे कहना ,
ज़बां से कोई बात निकली तो होती .
मोहब्बत तो करता है प्रदीप तुमसे ,
तपिश उसकी तुमने भी समझी तो होती .
मेरे दिल की हालत समझी तो होती .
तेरा रूठ जाना भी वाजिब है लेकिन ,
ज़रा मेरी मुश्किल भी समझी तो होती .
दिखावा मोहब्बत में न आता है मुझको,
जो हालत थी दिल की समझी तो होती .
हजारों तमन्ना बसी मेरे दिल में ,
कोई खाहिश तुमने भी समझी तो होती .
बहुत सारे अरमां थे मेरे दिल में ,
तुमने किसी की कद्र की तो होती .
तुम्हारे लिए ही धड़कता है ये दिल ,
कभी धड़कने भी समझी तो होती .
मोहब्बत के सावन बरसते हैं सब पे ,
कोई बारिश मुझपे भी बरसी तो होती .
तमन्ना मचलकर बयां हो ही जाती ,
ज़रा सी हवा जो दी तुमने होती .
मुलाक़ात तुमसे और जी भर के बातें ,
कहाँ मेरी किस्मत हकीकत ये होती .
ये दिल चाहता है बहुत तुमसे कहना ,
ज़बां से कोई बात निकली तो होती .
मोहब्बत तो करता है प्रदीप तुमसे ,
तपिश उसकी तुमने भी समझी तो होती .
प्रेमिका के लिए
तुम्हें दिल से लगाना चाहता हूँ,
तुम्हें अपना बनाना चाहता हूँ .
अपनी बांहों में भरके तुम्हें .
सारे जग से छुपाना चाहता हूँ
जिस घड़ी तेरे पास न हो कोई ,
मैं तेरे पास आना चाहता हूँ .
आज तक जो नहीं सुन पाया कोई ,
वही नग्मा सुनाना चाहता हूँ .
तमन्ना बसी है जो इस दिल में ,
वो सब तुमको बताना चाहता हूँ.
बहुत सी बातें अनकही हैं ,
वो सब तुमको सुनाना चाहता हूँ .
हुई मुद्दत मुझे आंसू बहाते ,
तेरी कुर्बत में मुस्कुराना चाहता हूँ .
छुपा जो भी प्रदीप के दिल में ,
हाल-ऐ-दिल सब बताना चाहता हूँ .
तुम्हें अपना बनाना चाहता हूँ .
अपनी बांहों में भरके तुम्हें .
सारे जग से छुपाना चाहता हूँ
जिस घड़ी तेरे पास न हो कोई ,
मैं तेरे पास आना चाहता हूँ .
आज तक जो नहीं सुन पाया कोई ,
वही नग्मा सुनाना चाहता हूँ .
तमन्ना बसी है जो इस दिल में ,
वो सब तुमको बताना चाहता हूँ.
बहुत सी बातें अनकही हैं ,
वो सब तुमको सुनाना चाहता हूँ .
हुई मुद्दत मुझे आंसू बहाते ,
तेरी कुर्बत में मुस्कुराना चाहता हूँ .
छुपा जो भी प्रदीप के दिल में ,
हाल-ऐ-दिल सब बताना चाहता हूँ .
Monday, March 16, 2009
बाप और बच्चे का वार्तालाप
आ ! बच्चे अब बाहर आ जा ,
देर न कर आ जल्दी आ जा .
ये है रंग रंगीली दुनिया , लगती है सपनीली दुनिया .
कैसे इसको छोड़ के आऊँ ? तेरी दुनिया से घबराऊँ .
बोलो फिर क्यों बाहर आऊँ ?
ये भी रंग - रंगीली दुनिया , ये भी तो है तेरी दुनिया .
हैं सब तुझको चाहने वाले, तेरे नाज़ उठाने वाले .
देखो सब हैं बांह पसारे , तुझे पुकारे सांझ सखा रे .
आ बच्चे अब बाहर आ जा .
देर न कर आ जल्दी आ जा .
बात तुम्हारी मुझे डराती , भेदभाव का भय दिखलाती .
कुछ ऐसा अहसास है मुझको , ढोंग बहुत है उस दुनिया में .
मुझको प्यारी अपनी दुनिया , पाक साफ़ छोटी सी दुनिया .
क्यों न मैं इस पर इतराऊँ , बोलो क्यों मैं बाहर आऊँ ?
माना भेदभाव है इसमें , जोड़ और बिखराव है इसमें .
दुःख के साथ-साथ हैं सुख भी , नए-नए अंदाज़ हैं इसमें .
कुछ खट्टी कुछ मीठी बातें , अंधियारी और उजली रातें .
आओ तुमको सभी दिखाऊँ , लेकिन पहले बाहर आओ .
देर करो मत ! जल्दी आओ ...........
ऐसे मुझको मत बहलाओ , मुझको अपनी दुनिया अच्छी .
छोटा सा संसार है मेरा , छोटा सा घर बार है मेरा .
रंग रूप का भेद नहीं है , यहाँ कोई लिंग भेद नहीं है .
मैं जब खुश हूँ अपने घर में , फिर बोलो क्यों बाहर आऊँ ?
छोडो अब वो रैन बसेरा , तुझे बुलाए नया सवेरा .
तेरी माता तड़प रही है , सुन तो ! कैसे बिलख रही है .
दर्द को उसके अब तो समझो, मेरे बच्चे कुछ तो समझो.
मत उसको तुम और सताओ , आओ जल्दी से आ जाओ .
माना कि वो तड़प रही है , और दर्द से बिलख रही है.
लेकिन मैं ये कैसे भूलूँ ? अपनी ऐश को कैसे भूलूँ ?
बिन मांगे सब मिलता मुझको, कुछ भी यहाँ न खलता मुझको .
इतनी अच्छी दुनिया तजकर ,
कैसे मैं उस जग में आऊँ ?
देर करो मत अब तुम ज्यादा ,
मैं करता हूँ इतना वादा .
यहाँ तुम्हें कोई कष्ट न होगा , यकीं करो कुछ कष्ट न होगा .
उस दुनिया जैसी ही तुमको , अपनी माँ की गोद मिलेगी .
भेद भाव न होगा तुमसे , अपने हक की ख़ुशी मिलेगी .
बस ! अब इसको मत तड़पाओ !
आओ जल्दी से आ जाओ !
लगता है कुछ बिछुड़ रहा है , अब ये डेरा उजड़ रहा है .
ख़त्म हुआ अब दाना पानी , अब याँ रहना है बेमानी .
मेरी माता तड़प रही है , दर्द से इतनी मचल रही है .
कैसे अब मैं आँखें मूंदूं ? जी करता है बाहर कूदूं .
तेरे वादे पर भी मुझको , हाँ हाँ इत्मीनान हुआ है .
अपना वादा भूल न जाना ,भेद भाव से दिल न दुखाना .
अच्छा माँ अब और न तड़पो !
तेरा पेट मैं छोड़ रही हूँ . ....
तेरी गोद की खातिर देखो , मैं इस घर को छोड़ रही हूँ .
x x x x x x x x x x
फिर मेरी कुछ तंद्रा टूटी , कोई मुझे झंझोड़ रहा था .
बाहर ठिठुरन थी कुछ ज्यादा , अन्दर से कुछ शोर हुआ था .
मेरी नातिन दौड़ी आई , एक ख़ुशी कि खबर सुनाई .
तुम्हें मुबारक ! लक्ष्मी आई , इक बच्ची तेरे घर आई .
गोद लिया तो देखा उसको ,
आँख खोल वो घूर रही थी .
जैसे मुझसे पूछ रही थी !
याद अभी तक है क्या वादा ?
बेशक ! बेशक ! याद है मुझको
और हमेशा याद रहेगा .
भेद भाव हरगिज़ न होगा .
भेद भाव हरगिज़ न होगा .
देर न कर आ जल्दी आ जा .
ये है रंग रंगीली दुनिया , लगती है सपनीली दुनिया .
कैसे इसको छोड़ के आऊँ ? तेरी दुनिया से घबराऊँ .
बोलो फिर क्यों बाहर आऊँ ?
ये भी रंग - रंगीली दुनिया , ये भी तो है तेरी दुनिया .
हैं सब तुझको चाहने वाले, तेरे नाज़ उठाने वाले .
देखो सब हैं बांह पसारे , तुझे पुकारे सांझ सखा रे .
आ बच्चे अब बाहर आ जा .
देर न कर आ जल्दी आ जा .
बात तुम्हारी मुझे डराती , भेदभाव का भय दिखलाती .
कुछ ऐसा अहसास है मुझको , ढोंग बहुत है उस दुनिया में .
मुझको प्यारी अपनी दुनिया , पाक साफ़ छोटी सी दुनिया .
क्यों न मैं इस पर इतराऊँ , बोलो क्यों मैं बाहर आऊँ ?
माना भेदभाव है इसमें , जोड़ और बिखराव है इसमें .
दुःख के साथ-साथ हैं सुख भी , नए-नए अंदाज़ हैं इसमें .
कुछ खट्टी कुछ मीठी बातें , अंधियारी और उजली रातें .
आओ तुमको सभी दिखाऊँ , लेकिन पहले बाहर आओ .
देर करो मत ! जल्दी आओ ...........
ऐसे मुझको मत बहलाओ , मुझको अपनी दुनिया अच्छी .
छोटा सा संसार है मेरा , छोटा सा घर बार है मेरा .
रंग रूप का भेद नहीं है , यहाँ कोई लिंग भेद नहीं है .
मैं जब खुश हूँ अपने घर में , फिर बोलो क्यों बाहर आऊँ ?
छोडो अब वो रैन बसेरा , तुझे बुलाए नया सवेरा .
तेरी माता तड़प रही है , सुन तो ! कैसे बिलख रही है .
दर्द को उसके अब तो समझो, मेरे बच्चे कुछ तो समझो.
मत उसको तुम और सताओ , आओ जल्दी से आ जाओ .
माना कि वो तड़प रही है , और दर्द से बिलख रही है.
लेकिन मैं ये कैसे भूलूँ ? अपनी ऐश को कैसे भूलूँ ?
बिन मांगे सब मिलता मुझको, कुछ भी यहाँ न खलता मुझको .
इतनी अच्छी दुनिया तजकर ,
कैसे मैं उस जग में आऊँ ?
देर करो मत अब तुम ज्यादा ,
मैं करता हूँ इतना वादा .
यहाँ तुम्हें कोई कष्ट न होगा , यकीं करो कुछ कष्ट न होगा .
उस दुनिया जैसी ही तुमको , अपनी माँ की गोद मिलेगी .
भेद भाव न होगा तुमसे , अपने हक की ख़ुशी मिलेगी .
बस ! अब इसको मत तड़पाओ !
आओ जल्दी से आ जाओ !
लगता है कुछ बिछुड़ रहा है , अब ये डेरा उजड़ रहा है .
ख़त्म हुआ अब दाना पानी , अब याँ रहना है बेमानी .
मेरी माता तड़प रही है , दर्द से इतनी मचल रही है .
कैसे अब मैं आँखें मूंदूं ? जी करता है बाहर कूदूं .
तेरे वादे पर भी मुझको , हाँ हाँ इत्मीनान हुआ है .
अपना वादा भूल न जाना ,भेद भाव से दिल न दुखाना .
अच्छा माँ अब और न तड़पो !
तेरा पेट मैं छोड़ रही हूँ . ....
तेरी गोद की खातिर देखो , मैं इस घर को छोड़ रही हूँ .
x x x x x x x x x x
फिर मेरी कुछ तंद्रा टूटी , कोई मुझे झंझोड़ रहा था .
बाहर ठिठुरन थी कुछ ज्यादा , अन्दर से कुछ शोर हुआ था .
मेरी नातिन दौड़ी आई , एक ख़ुशी कि खबर सुनाई .
तुम्हें मुबारक ! लक्ष्मी आई , इक बच्ची तेरे घर आई .
गोद लिया तो देखा उसको ,
आँख खोल वो घूर रही थी .
जैसे मुझसे पूछ रही थी !
याद अभी तक है क्या वादा ?
बेशक ! बेशक ! याद है मुझको
और हमेशा याद रहेगा .
भेद भाव हरगिज़ न होगा .
भेद भाव हरगिज़ न होगा .
Sunday, March 15, 2009
बहाना
काम जब भी नया कीजिये ,
दिल से ज़िक्र ऐ खुदा कीजिये .
उलझी लट पे उठे गर सवाल ,
फिर कुछ बहाना बना दीजिये .
गर छिड़े ज़िक्र ऐ दर्द औ ग़म ,
फिर ज़िन्दगी की हवा कीजिये .
दिल से चाहे जो उसके लिए ,
आप पलकें बिछा दीजिये .
क्या फिक्र जो हुआ ये खराब ,
काम फिर से नया कीजिये .
जाने वाले को मत टोकिए ,
हंस के उसको विदा कीजिये .
बख्श दो जो बुरा वो करे ,
पर बुराई मिटा दीजिये .
क्या हुआ जो गिरे बार बार ,
उठिए फिर हौसला कीजिये .
क्या करेंगे अँधेरे प्रदीप ,
कोई दीपक जला दीजिये .
दिल से ज़िक्र ऐ खुदा कीजिये .
उलझी लट पे उठे गर सवाल ,
फिर कुछ बहाना बना दीजिये .
गर छिड़े ज़िक्र ऐ दर्द औ ग़म ,
फिर ज़िन्दगी की हवा कीजिये .
दिल से चाहे जो उसके लिए ,
आप पलकें बिछा दीजिये .
क्या फिक्र जो हुआ ये खराब ,
काम फिर से नया कीजिये .
जाने वाले को मत टोकिए ,
हंस के उसको विदा कीजिये .
बख्श दो जो बुरा वो करे ,
पर बुराई मिटा दीजिये .
क्या हुआ जो गिरे बार बार ,
उठिए फिर हौसला कीजिये .
क्या करेंगे अँधेरे प्रदीप ,
कोई दीपक जला दीजिये .
एक झलक
मैं ये सोचकर उसके दर तक गया था कि झलक अपनी कोई दिखा देगी मुझको.
मगर उसने देखा न चेहरा दिखाया , अँधेरा था घर में नज़र कुछ न आया .
बहुत देर बैठा था पलकें बिछाए , के नज़रों को उसके दर पे टिकाये .
मगर वो न आये न दीपक जलाए , तमन्ना को सीने में यूं ही दबाये .
दरस बिन तरसती वो अँखियाँ छुपाये , मैं टूटे से दिल से वहाँ से उठा था .
क़दम ऐसे अंदाज़ से उठ रहे थे , के ज्यों लाश वो अपनी ही ढो रहे थे .
लचकती थी पिंडली खुद अपने वज़न से , वो हालत न पूछो अजी तुम क़सम से .
क़दम ज्यों धंसे हों ज़मीं दलदली में , बहुत टीस चुभती थी ज़मीं मखमली में .
उसकी गली से निकल कर अजी मैं ,जाने ये किस मोड़ पर आ गया हूँ .
उठा हाथ सीने की जानिब तो जाना , कि दिल तो वहीं छोड़कर आ गया हूँ .
मगर उसने देखा न चेहरा दिखाया , अँधेरा था घर में नज़र कुछ न आया .
बहुत देर बैठा था पलकें बिछाए , के नज़रों को उसके दर पे टिकाये .
मगर वो न आये न दीपक जलाए , तमन्ना को सीने में यूं ही दबाये .
दरस बिन तरसती वो अँखियाँ छुपाये , मैं टूटे से दिल से वहाँ से उठा था .
क़दम ऐसे अंदाज़ से उठ रहे थे , के ज्यों लाश वो अपनी ही ढो रहे थे .
लचकती थी पिंडली खुद अपने वज़न से , वो हालत न पूछो अजी तुम क़सम से .
क़दम ज्यों धंसे हों ज़मीं दलदली में , बहुत टीस चुभती थी ज़मीं मखमली में .
उसकी गली से निकल कर अजी मैं ,जाने ये किस मोड़ पर आ गया हूँ .
उठा हाथ सीने की जानिब तो जाना , कि दिल तो वहीं छोड़कर आ गया हूँ .
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