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Sunday, November 02, 2008

ग़ज़ल

सदियों बाद सुनी जो मैंने प्यारी सी आवाज़ ,
दिल ने चाहा क्या क्या कहना निकली न आवाज़ ।
जबां में लर्जिश और बात में तक़ल्लुफी थी हावी ,
कुछ मत पूछो यार हमारी खामोशी का राज़ ।
और सुनाओ और सुनाओ कैसे हो तुम यार ,
इन तक सारे प्रश्न थे सिमटे सुनकर वो आवाज़ ।
उनसे बात ही तो अपना फ़ोन हो गया बंद ,
मानो रहा न कुछ भी बाकी सुनकर वो आवाज़।
शर्म से चेहरा सुर्ख और हम हक हकलाते थे ,
ऐसा था कुछ हाल हमारा सुनकर वो आवाज़।
शहद टपकता था कानों में और ज़हन था सुन्न,
ऐसा था कुछ हाल हमारा सुनकर वो आवाज़ ।
वही खनक, वही धनक और वैसा ही था साज़ ,
सदियों बाद सुनी जो मैंने दिल की वो आवाज़।
मुद्दत से जिसको सुनने को बेकल था प्रदीप,
पानी पानी आज हुआ है सुनकर वो आवाज़ .

Saturday, October 25, 2008

ग़ज़ल

रोज़ तिल से पहाड़ होती गलती,
शुक्र ये कि अब नहीं होती गलती।
कोई अपना जो मुझसे रूठा है ,
अब ये दुनिया ही कुछ नहीं लगती ।
माफ़ी की अब भी है मुझे उम्मीद ,
बेशक वो थी बहुत बड़ी गलती।
मैं अगर देखता भी रहूँ मुड़कर ,
ज़िन्दगी किसी तरह नहीं थमती ।
आज भी उसकी जुस्तजू है मुझे ,
जिसकी कोई खबर नहीं मिलती ।
बंदिशें खुद ही लगाई हैं मैंने ,
कैसे तोडूं वजह नहीं मिलती ।
वो मेरे दिल में अब भी रौशन है ,
जिसकी सूरत भी अब नहीं दिखती ।
आग कुछ ऐसी लगाई थी मैंने ,
किसी सूरत भी जो नहीं बुझती ।
अपनी लाचारी क्या कहूं तुमसे ,
दिल तो चाहे, जुबां नहीं हिलती ।
दिल की बातें किसे कहे प्रदीप ,
अब तबीयत कहीं नहीं मिलती .

Friday, October 24, 2008

ग़ज़ल

मैं जो बैठा तन्हाँ तो आँख भर आई ,
हर तरफ अपनी ही खता नज़र आई ।
बाद मुद्दत भी तेरी गलियों में ,
वो ही रंगत मुझे नज़र आई ।
कोई झाँका जो आके छजली पे,
तेरी सूरत मुझे नज़र आई ।
देर तक बैंच पर मैं बैठा रहा,
जाने क्या सोच आँखें भर आई ।
याद करके वो गुजरी सब बातें ,
अपनी गलती ही बस नज़र आई।
कोई मिस काल जब भी आती है ,
मुझको लगता है तेरी काल आई ।
आइना अब भी है वही मगर ,
कोई सूरत नहीं नज़र आई ।
जब भी नाउम्मीद होता है प्रदीप ,
उसको सूरत-ए-सिया नज़र आई .

Monday, September 22, 2008

ग़ज़ल

मेरी सुबह तुमसे मेरी शाम तुमसे ,
अब है ज़िन्दगी का हर काम तुमसे ।
तुझे देखता हूँ तो लगता है ऐसे ,
कि बरसों से अपनी है पहचान तुमसे ।
धड़कता है दिल तो तेरा नाम आये ,
लो अब जुड गया है मेरा नाम तुमसे ।
हर एक शै में तेरा नज़र अक्श आये ,
अब आगाज़ तुमसे और अंजाम तुमसे ।
अब ये दिल भी तेरा, है प्रदीप तेरा ,
सिवाए मोहब्बत के न कुछ काम तुमसे .

Thursday, August 28, 2008

ग़ज़ल

दर्द आँखों में सिमट आया है ,
जाने कौन मुझे याद आया है ।
किस कदर ज़िन्दगी हुई तन्हाँ ,
हमसफ़र है न कोई साया है ।
कुछ तो मेरी खता रही होगी ,
उसने मुझको अगर भुलाया है।
जब बातें नहीं कोई उनसे ,
अपना साया हुआ पराया है।
उम्र भर कौन साथ देता है,
दिल को ऐसे ही अब मनाया है ।
जाने किसकी तलाश में प्रदीप ,
तूने अपना ही दिल जलाया है .

Sunday, August 17, 2008

ग़ज़ल

ठोकरें खाता है यां इंसान रोज़,
यूं दुखी रहता है यां इंसान रोज़ ।
आ गया तो खूब कर लो आ भगत ,
अब कहाँ आता है घर मेहमान रोज़ ।
मुद्दत हुई सीधी नहीं की बातचीत ,
पर खयालों में बहस होती है रोज़ ।
देखी हैं मैंने हसीनाएँ बहुत पर ,
आपमें कुछ और ही देखा है शोज़ ।
उड़ते फिरना आज़ाद पंछी की तरह ,
छोडो भी अब कहाँ है ऐसी मौज ।
हम भी सजधज कर चले बहना के घर ,
बाद मुद्दत के है आई भईया दौज ।
माँ की ममता अब हुई है खाब इक ,
जाने किस नफरत में जीते हैं अब रोज़ ।
मौत भी तो हो गई है खाब अब ,
ज़िन्दगी का ढ़ो रहा हूँ कब से बोझ ।
अपने दिल की कुछ नहीं कहता है वो ,
इक शिकन माथे पे बढ़ जाती है रोज़ ।
जाने ये कैसे गृहस्थी है प्रदीप ,
नित नई सी नोंक झौक रोज़ रोज़ ।

Monday, July 28, 2008

ग़ज़ल

ठोकरें खाता है यां इंसान रोज़,
यूं दुखी रहता है यां इंसान रोज़ ।
आ गया तो खूब कर लो आव भगत ,
अब कहाँ आता है घर मेहमान रोज़ ।
मुद्दत ही सीधी नहीं की बातचीत ,
पर खयालों में बहस होती है रोज़ ।
देखी हैं मैंने हसीनाएँ बहुत पर ,
आपमें कुछ और हाय देखा है शोज़ ।
उड़ते फिरना आज़ाद पंछी की तरह ,
छोडो भी अब कहाँ है ऐसी मौज ।
हम भी सजधज कर चले बहना के घर ,
बाद मुद्दत के है आये भईया दौज ।
मान की ममता अब ही है खाब इक ,
जाने किस नफरत में जीते हैं अब रोज़ ।
मौत भी तो हो गी है खाब अब ,
ज़िन्दगी का धो रहा हूँ कब से बोझ ।
अपने दिल की कुछ नहीं कहता है वो ,
इक शिकन माथे पे बढ़ जाती है रोज़ ।
जाने ये कैसे गृहस्थी है प्रदीप ,
नित नई सी नोंक झौक रोज़ रोज़ .