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Monday, July 30, 2012


मेरे  जैसे  बन जाओगे  जब  इश्क  तुम्हें  हो जाएगा ,
तन्हाई में  नगमें गाओगे जब इश्क तुम्हें  हो जाएगा.



इसी ज़मीन पर 

न भटकेगा मन  इधर उधर और नज़रें होंगी लक्ष्य पर,
अपनी धुन में रम जाओगे जब इश्क तुम्हें हो जाएगा.
है चहरे पर वो  चमक  तेरे  जो  दूर  अँधेरा  कर  देगी,
गर राह तुम्हें मिल जायेगी तो लक्ष्य हासिल हो जाएगा.
हर मुश्किल हो जाए आसां तुम हंस कर करना यार उसे,
ना बोझ लगेगा फिर कुछ भी जब इश्क तुम्हें हो जाएगा .
गर  राह  कहीं दुश्वार हुई  और हिम्मत की दरकार हुई,
हो कहीं भले  प्रदीप मगर फ़ौरन   हाज़िर   हो  जाएगा .


Saturday, June 02, 2012

 हमारे  देश में जैसे अक्सर बोली और पानी बदलते हैं
वो  इतनी जल्दी जल्दी आजकल बयानों को बदलते  हैं .
ककहरा  भी नहीं आया जिन्हें महंगाई  का  अब  तक, 
वो माहिर मुआशियत फिर भी  बड़े तन तन के चलते हैं .
कि अब के साल बारिश खूब और महंगाई कम होगी ,
हुई मुद्दत  उस  तरकश से अब फ़क़त दो तीर चलते हैं .
बढ़ा कर हद से ज्यादा भाव  फिर थोड़े से कम करना,
ये कातिल आजकल के  बारहा रहम कुछ ऐसे  करते हैं .
हुस्न वालों  को  पहले ही बहुत  बख्शा है  कुदरत ने ,
मगर फिर भी ना जाने क्यों वो बन ठन के चलते हैं .
ना जाने कौन अब प्रदीप बचाएगा  ये मुल्क उनसे ,
जो चारा, कोयला, सब कुछ  चबाये  बिन निगलते  हैं .

Monday, July 25, 2011

क्या सब कुछ बदल गया ?

क्या सब कुछ बदल गया ?
एक अरसे बाद गाँव गया,
तो बहुत कुछ बदला हुआ पाया ..
कच्ची गलियों की जगह पक्की सड़कें ,
कच्चे घरों की जगह ऊंची मंजिलें .
कभी कीचड भरी चौड़ी गलियां
आज पक्की मगर कुछ तंग हो गई हैं.
जैसे शहर में जगह की तंगी गाँव तक पसर गई है.
बाब्बा राम राम , मैंने राह में बुज़ुर्ग को देखते ही कहा
मगर उसने पहले मुझे घूर के देखा
और फिर पहचान कर, राम राम लिए बिना चुपचाप बगल से गुज़र गया .
मैंने साथ चलते राजू से पूछा ?
क्या बात है , बाब्बा ने राम राम भी नहीं ली .
वो अबके प्रधानी के इलेक्शन में हमारे साथ नहीं थे - राजू बोला .
ओह , ये बात है ...
इलेक्शन कि कडुवाहट अब तक बाकि है ,
तभी राम राम भी नहीं ली .
सांझ के वक़्त अब लोगों की चौपाल नहीं जमती
पंचायतों में बढ़ते धन ने दिलों के बीच दूरी
ज्यादा ही बढ़ा दी है --
सुबह बेबे से बासी रोटी मांगी
तो वो बोली अभी गरम रोटी बनवाती हूँ.
मगर बेबे - मैं तो यहाँ बासी रोटी खाने आया हूँ
गुड, नोणी घी और छा के साथ .
नहीं बेटा, गरमा गरम रोटी खा, दूध के साथ
शहर में दूध नहीं धोला पानी मिलता है .
मैं मन मारकर रह गया, क्या करता
बस ! ढूध के साथ गरम रोटी धकेल ली
और खेतों की तरफ निकल गया .
राह में फिर वही अनुभव लोग कटे कटे से दिखे
अकसर जो बहुत प्यार से मिलते थे आज
जुदा जुदा खिंचे खिंचे से दिखे .
गाँव के मेल मिलाप को तरसता
अपने मन में कुढ़ता बेमन से घर लौटा .
रात का खाना खाकर ताऊ के घर गया
तो वहाँ भी बहुत कुछ बदला पाया .
ढूध लोगे या चाय ताऊ ने पूछा .
मैंने सोचा ये क्या , पहले तो आते ही दूध मिलता था .
इसी सोच में मुंह से निकल गया दूध !
जवाब सुनते ही ताऊ चौंका !
क्या ? अब तक चाय पीना नहीं सीखे
चलो बढ़िया है शहर का रंग पूरा नहीं चढ़ा,
फिर क्या ताऊ ने दूध मंगवाया
तो मैं पीकर घर आया ,
आते ही बेबे बोली - कहाँ चला गया था ?
अब यहाँ बहुत कुछ बदल गया है
रात के बखत ज्यादा देर तक बाहर नहीं रहते
लोगों में रंजिश बहुत बढ़ गई है
अँधेरे में कोई कुछ भी कर सकता है
सुना नहीं परसों कालू को किसी ने चाक़ू घोंप दिया
गाँव में आना है तो संभल के आया कर
वरना वहीं कर खा
बेकार में हमारी परेशानी ना बढ़ा.
पता नहीं ये बेबे का डर था या गाँव की बदली हुई हवा !
मगर इतना तो तय है कि अब मेरे गाँव में बहुत कुछ बदल गया है
बहुत कुछ क्या सब कुछ बदल गया है .
सब कुछ बदल गया है .

Sunday, April 24, 2011

तलाश !

तलाश !
जी हाँ ज़िन्दगी इक तलाश ही तो है ........
तलाश पहले भी थी,
और आज भी है .....
मगर फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है
कि पहले मैं खूबसूरती में ज़िन्दगी ढूंढता था ,
और अब ज़िन्दगी में खूबसूरती ढूंढता हूँ ..........

Monday, November 08, 2010

दीवाली की शुभकामनाएँ

खुशियों की बारिश हो घर में
तुम्हे मिले हर जीत,
रोशन हो घर बार तुम्हारा
जले दीप से दीप,
धन वैभव हों साथ तुम्हारे
दुआ करे प्रदीप .

Tuesday, October 19, 2010

दरख़्त- नई ग़ज़ल

इतना करम रहा है मेरी जान ए सख्त का,
चर्चा रहा सदा इसी बरबाद-ए- वक्त का।

फूटी हैं कैसी-कैसी मुलायम सी कोंपलें
जज्बा तो देखिए जरा बूढ़े दरख़्त का ।

यूं तो किए हैं काम बहुत मैंने उम्र भर,
ख़ाना सदा खराब रहा मेरे बख्त का ।

अब तक किसी से भी मेरी ज्यादा न निभ सकी,
शायद मेरा मिजाज ही कुछ ज्यादा सख्त था।

मतलब निकल सके जहां मीठी ज़बान से,
क्या काम है वहां अलफाज़-ए-सख्त का।

आए हैं खाली हाथ तो जाना भी खाली हाथ,
मसरफ ही क्या है ऐसे में असबाब ओ रख़्त का।

जिसकी भरी हो झोली तजरुबाते ज़ीस्त से,
मोहताज क्यों रहे वो भला ताज-ओ-तख़्त का।

तारीफ़ बामुराद की अब क्या करे प्रदीप ,
देखा है जिसने खूं जिगर-ए-लख्त लख्त का।

Sunday, March 21, 2010

आइना


आइना हूं झूठ कहां भाता है मुझे,
जो दिखाओ वही नज़र आता है मुझे,
मेरी फितरत कौन बदल पाया है भला,
लाख तोड़ो सच ही नज़र आता है मुझे,
किसी को भी हाल-ए-दिल नहीं कहता ,
हर शख्‍स हंसता नज़र आता है मुझे,
सबसे हंस हंस के जितना मिलता है,
वो उतना ही दुखी नज़र आता है मुझे,
सच वालों के रूबरू होकर प्रदीप,
अपना क़द अदना नज़र आता है मुझे ।