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Sunday, March 21, 2010

आइना


आइना हूं झूठ कहां भाता है मुझे,
जो दिखाओ वही नज़र आता है मुझे,
मेरी फितरत कौन बदल पाया है भला,
लाख तोड़ो सच ही नज़र आता है मुझे,
किसी को भी हाल-ए-दिल नहीं कहता ,
हर शख्‍स हंसता नज़र आता है मुझे,
सबसे हंस हंस के जितना मिलता है,
वो उतना ही दुखी नज़र आता है मुझे,
सच वालों के रूबरू होकर प्रदीप,
अपना क़द अदना नज़र आता है मुझे ।

Tuesday, August 18, 2009

याद

याद की कुछ वजह तो होती है,
हाय ये भी बेसबब नहीं आती ;
वो मेरे पास है साए की तरह ,
मगर उससे लिपट नहीं पाती ;
वो भले मुझसे दूर हो लेकिन ,
याद उसकी कहीं नहीं जाती ;
सितम उसके कम नहीं मुझपे,
पर वफ़ा भी भुला नहीं पाती ;
जो गुज़ारे हैं साथ दोनों ने ,
मैं वो पल भुला नहीं पाती;
फिर कभी कहीं मिलें शायद,
खुद को यूं मिटा नहीं पाती;
प्रदीप तुझको कैसे समझाऊं,
मैं ये खुद समझ नहीं पाती;

दो घड़ी

हम करें क्‍यों किसी की निन्‍दा,
कौन जाने हों दो घड़ी जिन्‍दा ;
तुमने मुझपे किए करम इतने,
एक पत्‍थर को कर दिया जिंदा;
जान होते हुए भी था मुर्दा ,
तुम मिले तो हो गया जिंदा;
ढल गई शाम हो लें रूखसत,
हम सुबह को मिलेंगे आइंदा;
मुझको खुश करोगी फिर हंसके,
देर तक कब रहा हूं आज़ुर्दा ;
पिंजरे से एक दिन उड़ जाएगा,
क़ैद कब तक रहेगा परिन्‍दा ;
सारी दुनिया को लूटकर देखो,
नेताजी कह रहा है दो चन्‍दा ;
महंगाई ज़ीरो तले भी जा पहुंची,
हमको ना कुछ दिखा कहीं मन्‍दा;
जो मिला पहले जी लें जी भरके,
बाद सोचेंगे क्‍या रहा पसमान्‍दा;
तुम मेरी जान मेरी मंजिल हो,
प्रदीप क्‍यूं भला हो शर्मिंदा ;

Monday, August 10, 2009

नाम

है बात अलग ये कोई क्‍या क्‍या कमाता है,
कोई दाम कमाता और कोई नाम कमाता है ;
आराम किसे नसीब है इस दुनिया में यारों,
कोई हंसके बिताता, कोई रोके बिताता है ;
हैं दर्द बहुत यूं तो हर सीने में लेकिन ,
कोई खुद से छिपाता, कोई सबको बताता है ;
उस शख्‍स का तो यारों अंदाज जुदा है कुछ,
वो दिल की तपिश को भी आंसू से बुझाता है;
कोई काम नहीं उसको ये सच है मगर लेकिन,
वो सुबह का निकला, घर रात को आता है;
जीने की तमन्‍ना में हम रोज ही मरते हैं,
कहीं सौदा इज्‍ज्‍त का, कोई आन गवांता है;
बदलेंगी नहीं रोकर ये हाथों की रेखाएं ,
अनमोल घड़ी तू फिर क्‍यों यूं ही गवांता है.
ले दे के फ़क़त मैंने बस इतना कमाया है,
प्रदीप अंधेरों को खुद जल के भगाता है ;

Wednesday, July 15, 2009

सिलसिला

घुप्‍प अंधेरा भगाने को क्‍या चाहिए ,
एक जलता हुआ बस दिया चाहिए .
जो न टूटे कभी भी किसी हाल में ,
अब तो ऐसा कोई सिलसिला चाहिए .
कितनी खामोशियाँ देखो पसरी यहाँ,
इस जहां में कोई जलजला चाहिए .
हो गई है जमा अपने रिश्तों में बर्फ,
हमको फिर आग़ाज ऐ मुरासला चाहिए.
हो रही है थकन फिर भी कट जाएगा,
इस सफ़र को तो अब मरहला चाहिए.
खाली बातों से कब बदले हैं निज़ाम ,
बेशक उसके लिए मुक़ातला चाहिए .
खाली रहने से तो अब न होगी गुज़र,
ज़िन्दगी के लिए कोई मशग़ला चाहिए.
कैसा ये और बोलो है किसका निज़ाम,
जिसको हर हाल में मदख़ला चाहिए .
आदमी की वहां क्‍या होगी बिसात ,
ख़ुदा से भी जहां मोजिज़ा चाहिए.
आपको चाहा तो क्‍यूं हुए हो ख़फ़ा ,
फांसी के वास्‍ते तो मज़लमा चाहिए .
जिनको तन्हाइयों ने सताया बहुत ,
प्रदीप उनको कोई हमइना चाहिए .

Monday, June 22, 2009

भगवान का रूप

मेरी बीवी
तीन साल की बच्ची से अक्सर ये पूछती है -
बेटी आप किससे ज्यादा प्यार करती हो ?
मम्मी से या पापा से !
तो वो सदा एक ही जवाब देती है --
दोनों से .
मैं जब भी उसे बाहर लेकर जाता हूँ
तो वो अक्सर कोई चीज़
खाने की ज़िद करती है;
खा तो पूरी एक भी नहीं पाती
मगर लेती हमेशा तीन है .
मैं इस गणित से होकर हैरान,
जब भी पूछता हूँ कुछ सवाल !
तो उसका एक ही जवाब होता है -
एक मम्मी के लिए,
एक पापा के लिए
और एक मेरे लिए .
अपने सीधे जवाबों से वो सदा यही समझाती है
कि बच्चे भगवान का रूप होते हैं,
इंसान अँधेरा तो वो धूप होते है .
भेदभाव को भला कब जानते है !
इसीलिए तो सबको समान मानते हैं !
इसीलिए तो सबको समान मानते हैं !!!

Friday, June 12, 2009

तुम

मुझे गुल मिले या खार, नहीं छूटता कोई,
आदत का हूँ गुलाम खुद दोषी नहीं कोई.
रहते थे तुम जो सामने रोता नहीं था दिल ,
बस इतनी ख़ुशी भी आपसे देखी नहीं गई .
फुरक़त के शब्-ओ-रोज बिताने के लिए ,
चिट्ठी लिखी बहुत मगर भेजी नहीं गई .
कल मिले और आज जुदा हो रहे हैं हम ,
दो चार पल की ख़ुशी भी सहेजी नहीं गई .
महंगाई जीरो पर है ये सरकार कह रही ,
कीमत किसी भी चीज़ की नीचे नहीं गई .
जो कुछ मिला, है मुझे जान से अजीज़ ,
मुझसे कोई भी चीज़ कभी छोड़ी नहीं गई.
यूं तो मुझे मिले बहुत लेकिन क्या करुँ ,
बन जाए मेरा दोस्त वो आया नहीं कोई.
जो भी मिला उसी में प्रदीप रहा मस्त ,
औरों की ख़ुशी से उसे चिढ़ नहीं रही .