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Saturday, April 04, 2009

मैं और मेरी धड़कन

रखूंगा अपने दिल में तुम्हें धड़कन की तरह,
धड़का सदा करोगी मेरी धड़कन की तरह .
मुश्किल हो कि आसां हो जैसी भी घड़ी हो,
रखूंगा तुम्हें अपने साथ दर्पण की तरह .
कहने को तो हम बेशक़ न साथ रहेंगे ,
पर साथ सदा होंगे हमसाए की तरह .
कोई साथ नहीं रहता ता हस्र भले लेकिन,
हम साथ रहेंगे सदा किसी खुशबू की तरह .
जब तपती दुपहरी में साया भी न दे साथ ,
दो जिस्मों में होंगे हम एक जान की तरह .
क्यों डर हो बिछुड़ने का तुमसे मुझे हर पल,
जब आन बसी दिल में धड़कन की तरह .
इस दौर के इन्सान तो हो गए मशीन ,
खा जाते हैं रिश्तों को इंधन की तरह .
ये कैसी हवा अब के इस शहर में आई ,
क्यों दोस्त भी लगते हैं दुश्मन की तरह .
तुमको मेरी उल्फत पे ऐतबार नहीं लेकिन ,
क्यों उसको दिखाऊँ किसी फैशन की तरह.
माना कि अन्धेरा है इस जीवन में बहुत ,
प्रदीप संग जलेगा शमां-ऐ-रोशन की तरह .

4 comments:

Renu Sharma said...

is daur ke insaan to ho gaye masheen
kha jate hain rishton ko iidhan ki tarah .
wah wah ....
bahut khoob .
prdeep ji ,achchha likha hai .

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण रचना!
आप का ब्लाग बहुत अच्छा लगा।
मैं अपने तीनों ब्लाग पर हर रविवार को
ग़ज़ल,गीत डालता हूँ,जरूर देखें।मुझे पूरा यकीन
है कि आप को ये पसंद आयेंगे।

Aapki Smita! said...

jiske baare mein likhi hai, unse nahi poocha k kaisi lagi? the romantic aspect is wat interested me.. aur jis tarah se aapne aaj k insaan ki comparison ki hai machine se tats fabulous.. mindblowing...

Shama said...

Mai apneaapko apkee rachnaape tippanee deneke qabil to nahee samajhtee...phirbhee jurrat kar rahee hun...!

Shayad harek rachnaa apne aapme alag tippanee kee haqdaar hai...
"wo khushnaseeb hai, jise too apnee dhadkanon me rakhe, warnaa log apnee dhadkanko bedakhal kar dete hain...!"

Aapne mere blogpe tippanee dee,iske liye shukrguzar hun...lekin" proof" ko edit karnekee baat nahee samajhee...kahan pe galatee hai?
Mai apnee kavita," beaabroo hoke nikale", kee baat kar rahee hun...gar margdarshan karen to aabharee rahungee...