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Tuesday, March 31, 2009

चुप की ज़बान

चुप की ज़बां कभी समझी तो होती ,
मेरे दिल की हालत समझी तो होती .
तेरा रूठ जाना भी वाजिब है लेकिन ,
ज़रा मेरी मुश्किल भी समझी तो होती .
दिखावा मोहब्बत में न आता है मुझको,
जो हालत थी दिल की समझी तो होती .
हजारों तमन्ना बसी मेरे दिल में ,
कोई खाहिश तुमने भी समझी तो होती .
बहुत सारे अरमां थे मेरे दिल में ,
तुमने किसी की कद्र की तो होती .
तुम्हारे लिए ही धड़कता है ये दिल ,
कभी धड़कने भी समझी तो होती .
मोहब्बत के सावन बरसते हैं सब पे ,
कोई बारिश मुझपे भी बरसी तो होती .
तमन्ना मचलकर बयां हो ही जाती ,
ज़रा सी हवा जो दी तुमने होती .
मुलाक़ात तुमसे और जी भर के बातें ,
कहाँ मेरी किस्मत हकीकत ये होती .
ये दिल चाहता है बहुत तुमसे कहना ,
ज़बां से कोई बात निकली तो होती .
मोहब्बत तो करता है प्रदीप तुमसे ,
तपिश उसकी तुमने भी समझी तो होती .

1 comment:

alka sarwat said...

प्रदीप जी,
जय हिंद
आपने मेरा ब्लॉग पढ़ा ,धन्यवाद .आपकी बच्ची को जटामांसी का काढा एक हफ्ते पिलाना पडेगा फिर बच की १/४ ग्राम मात्र दो दिनों तक खिलानी होगी .वह एकदम ठीक हो जायेगी अगर तकलीफ न हो तो फोन पर मुझे विस्तार से बता दें न०. ब्लॉग में है
आपने ghazal लिखने की behatreen कोशिश की है लेकिन कुछ panctiyaan matraon से baahar हैं kripyaa buraa मत maniyegaa .