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Sunday, March 15, 2009

मुक्ति चाहता हूँ मैं

मुक्ति चाहता हूँ मैं
रिश्तों के जंजाल से , ज़िन्दगी के जाल से .
हाल के बेहाल से , बेबसी के जाल से .
दर्द से मलाल से मुक्ति चाहता हूँ मैं .....
सब तरफ फरेब है , फरेब ही फरेब है .
स्वार्थी मनुष्य है , स्वार्थ ही स्वार्थ है .
इस फरेब औ एब से , मनुष्य के स्वार्थ से .
मुक्ति चाहता हूँ मैं -------
जो तुम्हें दिया हुआ , उससे हूँ बंधा हुआ .
कौल वो अमोल है , घुटन भरा माहौल है .
सांस कुंद कुंद से, इस घुटन की जिंद से .
मुक्ति चाहता हूँ मैं ........
कसमसाहट है बहुत , छट पटाहट है बहुत .
आजकल इस मन में कस मसाहट है बहुत .
जिससे हूँ बंधा हुआ , उस वचन को फेर लो .
आज उस वचन से बस . मुक्ति चाहता हूँ मैं ........
सुलग रहा है तन मेरा , जल रहा बदन मेरा .
क्रोध की अगन में आज, उबल रहा बदन मेरा .
उस वचन से , इस अगन से , मुक्ति चाहता हूँ मैं ....
काम में लगे नहीं , घर में भी लगे नहीं .
आज इस जहान में , कुछ मुझे जांचे नहीं .
इस सुलगती आग से , अपने फूटे भाग से .
मुक्ति चाहता हूँ मैं .........
कल तलक सभी को जो , सिखा रहा था ज़िन्दगी .
आज उसी शख्स को , सिखा रही है ज़िन्दगी .
इस सीखने सिखाने से , और इस ज़माने से .
मुक्ति चाहता हूँ मैं .........
मुक्ति चाहता हूँ मैं ...............

1 comment:

Smita said...

Kis baat se mukti chahte hai aap? In choti choti baaton mein hi to zindgai ka saar hai. Jitni mili hai usse hans k hi guzara jaye, kyu theek hai na...