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Sunday, March 15, 2009

एक झलक

मैं ये सोचकर उसके दर तक गया था कि झलक अपनी कोई दिखा देगी मुझको.
मगर उसने देखा न चेहरा दिखाया , अँधेरा था घर में नज़र कुछ न आया .
बहुत देर बैठा था पलकें बिछाए , के नज़रों को उसके दर पे टिकाये .
मगर वो न आये न दीपक जलाए , तमन्ना को सीने में यूं ही दबाये .
दरस बिन तरसती वो अँखियाँ छुपाये , मैं टूटे से दिल से वहाँ से उठा था .
क़दम ऐसे अंदाज़ से उठ रहे थे , के ज्यों लाश वो अपनी ही ढो रहे थे .
लचकती थी पिंडली खुद अपने वज़न से , वो हालत न पूछो अजी तुम क़सम से .
क़दम ज्यों धंसे हों ज़मीं दलदली में , बहुत टीस चुभती थी ज़मीं मखमली में .
उसकी गली से निकल कर अजी मैं ,जाने ये किस मोड़ पर आ गया हूँ .
उठा हाथ सीने की जानिब तो जाना , कि दिल तो वहीं छोड़कर आ गया हूँ .

1 comment:

Smita said...

kya baat hai... Kahan dil chodd aaye aap? Waise sach kahun to pyar mein aisa hi hota hai.. Apna dil bhi apna nahi rehta.. dhadakta hai hamare seene mein, par kisi aur k liye..